उड़ते सपनों की क़ोइनोबोरी
जापान के एक छोटे से पहाड़ी गाँव, हनामीरा में, हर साल वसंत के आते ही रंग-बिरंगी क़ोइनोबोरी आसमान में लहराने लगती थीं। क़ोइनोबोरी—कार्प मछली के आकार की पताकाएँ—हवा के साथ ऐसे तैरतीं मानो आसमान में नदी बह रही हो। गाँव के लिए ये सिर्फ सजावट नहीं थीं, बल्कि हिम्मत, मेहनत और सपनों की निशानी थीं। आइको दस साल की थी। उसके घर के सामने एक पुराना चेरी का पेड़ था, जिसकी डालियों से उसके दादाजी हर साल क़ोइनोबोरी बाँधते थे। दादाजी कहते, “कार्प मछली तेज़ धार के खिलाफ तैरती है। इसलिए क़ोइनोबोरी हमें सिखाती है कि मुश्किलें चाहे जितनी हों, आगे बढ़ते रहो।” लेकिन इस साल सब कुछ अलग था। दादाजी अब नहीं रहे थे। आइको के लिए वसंत की हवा भी खाली-सी लग रही थी। चेरी के फूल खिले थे, पर उसके दिल में उदासी थी। उसने देखा कि आसपास के घरों में क़ोइनोबोरी उड़ रही थीं, मगर उसके घर के आँगन में आसमान सूना था। एक शाम, आइको ने दादाजी की पुरानी अलमारी खोली। अंदर कपड़ों के नीचे एक कपड़े की थैली मिली। थैली खोलते ही उसकी आँखें चमक उठीं—एक हाथ से बनी क़ोइनोबोरी। नीले रंग की, सुनहरे पंखों वाली, और उस पर हल्क...