उड़ते सपनों की क़ोइनोबोरी

       जापान के एक छोटे से पहाड़ी गाँव, हनामीरा में, हर साल वसंत के आते ही रंग-बिरंगी क़ोइनोबोरी आसमान में लहराने लगती थीं। क़ोइनोबोरी—कार्प मछली के आकार की पताकाएँ—हवा के साथ ऐसे तैरतीं मानो आसमान में नदी बह रही हो। गाँव के लिए ये सिर्फ सजावट नहीं थीं, बल्कि हिम्मत, मेहनत और सपनों की निशानी थीं।

आइको दस साल की थी। उसके घर के सामने एक पुराना चेरी का पेड़ था, जिसकी डालियों से उसके दादाजी हर साल क़ोइनोबोरी बाँधते थे। दादाजी कहते, “कार्प मछली तेज़ धार के खिलाफ तैरती है। इसलिए क़ोइनोबोरी हमें सिखाती है कि मुश्किलें चाहे जितनी हों, आगे बढ़ते रहो।”

लेकिन इस साल सब कुछ अलग था। दादाजी अब नहीं रहे थे। आइको के लिए वसंत की हवा भी खाली-सी लग रही थी। चेरी के फूल खिले थे, पर उसके दिल में उदासी थी। उसने देखा कि आसपास के घरों में क़ोइनोबोरी उड़ रही थीं, मगर उसके घर के आँगन में आसमान सूना था।

एक शाम, आइको ने दादाजी की पुरानी अलमारी खोली। अंदर कपड़ों के नीचे एक कपड़े की थैली मिली। थैली खोलते ही उसकी आँखें चमक उठीं—एक हाथ से बनी क़ोइनोबोरी। नीले रंग की, सुनहरे पंखों वाली, और उस पर हल्के से सिले हुए शब्द: “हिम्मत”।

आइको की आँखें भर आईं। उसे याद आया, दादाजी कहा करते थे कि यह क़ोइनोबोरी खास है, क्योंकि इसे उन्होंने तब बनाया था जब वे खुद बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रहे थे। “जब हवा कमज़ोर हो,” वे कहते, “तो पताका को और मज़बूती से बाँधना पड़ता है।”

अगले दिन गाँव में बच्चों का उत्सव था। सब बच्चे अपनी-अपनी क़ोइनोबोरी लेकर नदी किनारे इकट्ठा हुए। हवा तेज़ थी, आसमान साफ़ था। आइको हिचकिचा रही थी—क्या वह अपनी क़ोइनोबोरी उड़ाए? उसे डर था कि अगर हवा में उलझ गई या गिर गई तो?

तभी उसकी सहेली मीना ने पूछा, “तुम्हारी क़ोइनोबोरी कहाँ है?”

आइको ने थैली दिखाई। मीना मुस्कुराई, “चलो न, इसे भी उड़ाओ। दादाजी को अच्छा लगेगा।”

आइको ने नदी किनारे एक बाँस का डंडा गाड़ा। हाथ काँप रहे थे, पर उसने क़ोइनोबोरी को बाँध दिया। जैसे ही हवा चली, नीली क़ोइनोबोरी फड़फड़ाई… और फिर हवा में तैरने लगी। सूरज की रोशनी में उसके सुनहरे पंख चमक उठे।

कुछ पल के लिए आइको को लगा जैसे दादाजी उसके पास खड़े हैं। हवा ने ज़ोर पकड़ा, और क़ोइनोबोरी ऊँची उड़ने लगी—दूसरों से थोड़ी अलग, थोड़ी ज़्यादा मज़बूत।

अचानक एक तेज़ झोंका आया। कई बच्चों की क़ोइनोबोरी उलझ गईं। लोग घबरा गए। आइको की क़ोइनोबोरी भी डगमगाई। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने डंडे को कसकर पकड़ लिया, जैसे दादाजी ने सिखाया था। कुछ ही पलों में हवा स्थिर हुई, और उसकी क़ोइनोबोरी फिर से सीधी उड़ने लगी।

लोगों ने ताली बजाई। आइको मुस्कुराई—पहली बार उस वसंत में दिल से।

उस शाम, जब सूरज ढल रहा था, आइको ने महसूस किया कि दुख कहीं गया नहीं है, लेकिन अब उसके साथ हिम्मत भी है। क़ोइनोबोरी सिर्फ आसमान में नहीं उड़ रही थी; वह आइको के अंदर भी कुछ जगा रही थी—आगे बढ़ने का साहस।

घर लौटते वक्त उसने चेरी के पेड़ की डाल से क़ोइनोबोरी बाँध दी। हवा में लहराती पताका ने जैसे फुसफुसाकर कहा—मुश्किलें आएँगी, पर तुम तैरना मत भूलना।

और उस रात, हनामीरा के आसमान के नीचे, एक नीली क़ोइनोबोरी सपनों के साथ उड़ती रही।

टिप्पणियाँ